कैवल्य उपनिषद के अनुसार ह्रदय गुहा में प्रवेश कैसे हो सकता है?
कैवल्य उपनिषद के अनुसार सांख्य और योग;-
12 तथ्य--
(१)
1-कैवल्य उपनिषद इस सूत्र पर समाप्त होता है ...''मेरे लिए भूमि, जल, अग्रि, वायु आकाश कुछ नहीं है।वही मनुष्य मेरे शुद्ध परमात्म स्वरूप का साक्षात्कार करता है, जो मायिक प्रपंचों से परे, सब के साक्षी,सत -असत
अर्थात अस्तित्व-अनस्तित्व से परे, निराकार, हृदय की गुहा में स्थित
इस सूत्र में सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात समझने की है कि उस परम सत्ता को जानने वाला हृदय की गुहा में प्रवेश पाता है, या फिर हृदय की गुहा में प्रवेश करने वाला उस परम सत्ता को जान लेता है। ये दो ही उपाय है।इसलिए दो ही निष्ठाएं हैं मनुष्य की साधना की।
2-जीवन के सत्य को जानने की दो निष्ठाएं मानी जाती हैं।एक का नाम है सांख्य और दूसरे का नाम है योग।सांख्य का अर्थ है, जो उस परम सत्ता को जान लेता है वह हृदय की गुहा में प्रविष्ट हो जाता है। योग का अर्थ है, जो हृदय की गुहा में प्रविष्ट हो जाता है ;वह उस परम सत्ता को जान लेता है।
सांख्य शुद्ध ज्ञान है और योग साधना है।सांख्य कहता है कि करना कुछ भी नहीं है, सिर्फ जानना है।योग कहता है कि करना बहुत कुछ है और तभी जानना फलित होगा।यह दोनों ही सही हैं और यह दोनों ही गलत भी हो सकते हैं।ये निर्भर करेगा एक साधक पर।
3-अगर कोई साधक ज्ञान की अग्रि इतनी जलाने में समर्थ हो कि उस अग्रि में उसका अहंकार जल जाए, सिर्फ ज्ञान की अग्रि ही रह जाए अथार्त ज्ञान ही रह जाए, ज्ञाता न रहे; भीतर कोई अहंकार का केंद्र न रह जाए, सिर्फ जानना मात्र रह जाए, बोध/अवेयरनेस' रह जाए तो कुछ भी करने की
जरूरत नहीं है।जानने की इस अग्रि से ही सब कुछ हो जाएगा।जानने की ही चेष्टा करना ; उसी स्थिति को बढ़ाने के लिए प्रतिदिन अग्रसर होना पर्याप्त है।अथार्त होश बढ़ जाए और जागृति आ जाए।
4-लेकिन करोङो में किसी एक व्यक्ति के साथ यह घटना घटती है।और जिस व्यक्ति के साथ भी यह घटना घटती है, वह भी न मालूम कितने जन्मों की चेष्टाओं का फल होता है।लेकिन जब भी सांख्य की घटना किसी को घटती है तो वैसे व्यक्ति को प्रतीत होता है कि सिर्फ जानना काफी है। जानने से ही सब कुछ हो गया।वह सांख्य योग के विपरीत बातें करता
है।क्योंकि जिसको भी सांख्य की अवस्था उत्पन्न होगी, उसे लगेगा कि कुछ और तो करना ही नहीं पड़ता है ..सिर्फ होश से भर जाना काफी है।लेकिन उसके अनंत जन्मों में करने से ही अनंत धाराएं बहती हैं।
5-लेकिन जो बेहोश पड़ा है, उसे होश से भर जाना ही तो सबसे बड़ी उलझन की बात है। जिसकी नींद खुल गयी, वह कह सकता है कि मुझे कुछ और नहीं करना पड़ा, नींद खुल गयी और मैंने प्रकाश का दर्शन कर लिया। लेकिन जो सोया पड़ा है, और सोया ही नहीं जहर खाकर बेहोश पड़ा है, उससे हम चिल्ला चिल्लाकर कहते रहें कि जागो, सिर्फ जागना काफी है, नींद का टूट जाना काफी है, कुछ करने की जरूरत नहीं और सत्य उपलब्ध हो जाएगा...तो ये बातें भी उसे सुनायी नहीं पड़ती।जो अभी मूर्छित है, पहले तो उसकी मूर्छा तोड़नी पड़ेगी, ताकि वह सुन सके।आंख खोलने की बात भी तो उसके भीतर पहुंचनी चाहिए।
6-इसलिए सांख्य की मान्यता बिलकुल सही होकर भी काम नहीं कर पाती है।सांख्य का कोई व्यक्तित्व सांख्य की बातें कहे चला जाता है कि कुछ भी करना जरूरी नहीं है ;सिर्फ होश से भर जाना काफी है।लेकिन लोगों को सुनायी ही नहीं पड़ता है।क्योंकि वे सोए हुए नहीं हैं, वे मूर्च्छित हैं।और उनकी समझ में भी आ जाता है, तब वह समझ मात्र बौद्धिक होती है,अथार्त ऊपरी होती है।शब्द , सिद्धांत पकड लेते हैं और फिर उन्हीं सिद्धांतों को दोहराने भी लगते हैं। लेकिन उनके जीवन में कहीं कोई रूपांतरण नहीं होता।
7-सांख्य एक फूल की तरह है और जब फूल खिलता है, तब हमें जड़ों का खयाल भी नहीं आता।क्योंकि जड़ें तो अंधेरे गर्त में, पृथ्वी में छिपी पड़ी होती हैं। लेकिन वर्षों तक जड़ें निर्मित होती हैं, फिर पौधा निर्मित होता है और तब कहीं फूल खिलता है।फूल का खिल जाना एक लंबी शृंखला का हिस्सा है।जब फूल खिलता है तो सारी शृंखला भूल जाती है। जब फूल खिलता है तब सारी शृंखला छिप जाती है।और जब अंतिम फल आता है तो उस फल के आच्छादन में सब कुछ विस्मृत हो जाता है, जो लंबी यात्रा है।
8-लेकिन फूल न खिला हो, तो किसी से यह कहना कि फूल खिलना काफी है, खतरनाक भी हो सकता है। क्योंकि वह व्यक्ति जड़ों को संभालने के लिए और पौधे को बड़ा करने के लिए जो कर सकता था वह भी नहीं करेगा।अब तो वह भी यह सोचेगा, फूल खिल जाना काफी है, खिल जाएंगे। और खिलना तो एक लंबी शृंखला का हिस्सा है।जब लोग समझ लेते हैं
कि कुछ नहीं करना है तो जो कर रहे थे वह भी छोड़ देते हैं।और जिस फूल के खिलने की बात हैं; वह फूल भी नहीं खिलता।
क्रमशः
@Sanatan
कैवल्य उपनिषद के अनुसार सांख्य और योग;-
12 तथ्य--
(१)
1-कैवल्य उपनिषद इस सूत्र पर समाप्त होता है ...''मेरे लिए भूमि, जल, अग्रि, वायु आकाश कुछ नहीं है।वही मनुष्य मेरे शुद्ध परमात्म स्वरूप का साक्षात्कार करता है, जो मायिक प्रपंचों से परे, सब के साक्षी,सत -असत
अर्थात अस्तित्व-अनस्तित्व से परे, निराकार, हृदय की गुहा में स्थित
इस सूत्र में सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात समझने की है कि उस परम सत्ता को जानने वाला हृदय की गुहा में प्रवेश पाता है, या फिर हृदय की गुहा में प्रवेश करने वाला उस परम सत्ता को जान लेता है। ये दो ही उपाय है।इसलिए दो ही निष्ठाएं हैं मनुष्य की साधना की।
2-जीवन के सत्य को जानने की दो निष्ठाएं मानी जाती हैं।एक का नाम है सांख्य और दूसरे का नाम है योग।सांख्य का अर्थ है, जो उस परम सत्ता को जान लेता है वह हृदय की गुहा में प्रविष्ट हो जाता है। योग का अर्थ है, जो हृदय की गुहा में प्रविष्ट हो जाता है ;वह उस परम सत्ता को जान लेता है।
सांख्य शुद्ध ज्ञान है और योग साधना है।सांख्य कहता है कि करना कुछ भी नहीं है, सिर्फ जानना है।योग कहता है कि करना बहुत कुछ है और तभी जानना फलित होगा।यह दोनों ही सही हैं और यह दोनों ही गलत भी हो सकते हैं।ये निर्भर करेगा एक साधक पर।
3-अगर कोई साधक ज्ञान की अग्रि इतनी जलाने में समर्थ हो कि उस अग्रि में उसका अहंकार जल जाए, सिर्फ ज्ञान की अग्रि ही रह जाए अथार्त ज्ञान ही रह जाए, ज्ञाता न रहे; भीतर कोई अहंकार का केंद्र न रह जाए, सिर्फ जानना मात्र रह जाए, बोध/अवेयरनेस' रह जाए तो कुछ भी करने की
जरूरत नहीं है।जानने की इस अग्रि से ही सब कुछ हो जाएगा।जानने की ही चेष्टा करना ; उसी स्थिति को बढ़ाने के लिए प्रतिदिन अग्रसर होना पर्याप्त है।अथार्त होश बढ़ जाए और जागृति आ जाए।
4-लेकिन करोङो में किसी एक व्यक्ति के साथ यह घटना घटती है।और जिस व्यक्ति के साथ भी यह घटना घटती है, वह भी न मालूम कितने जन्मों की चेष्टाओं का फल होता है।लेकिन जब भी सांख्य की घटना किसी को घटती है तो वैसे व्यक्ति को प्रतीत होता है कि सिर्फ जानना काफी है। जानने से ही सब कुछ हो गया।वह सांख्य योग के विपरीत बातें करता
है।क्योंकि जिसको भी सांख्य की अवस्था उत्पन्न होगी, उसे लगेगा कि कुछ और तो करना ही नहीं पड़ता है ..सिर्फ होश से भर जाना काफी है।लेकिन उसके अनंत जन्मों में करने से ही अनंत धाराएं बहती हैं।
5-लेकिन जो बेहोश पड़ा है, उसे होश से भर जाना ही तो सबसे बड़ी उलझन की बात है। जिसकी नींद खुल गयी, वह कह सकता है कि मुझे कुछ और नहीं करना पड़ा, नींद खुल गयी और मैंने प्रकाश का दर्शन कर लिया। लेकिन जो सोया पड़ा है, और सोया ही नहीं जहर खाकर बेहोश पड़ा है, उससे हम चिल्ला चिल्लाकर कहते रहें कि जागो, सिर्फ जागना काफी है, नींद का टूट जाना काफी है, कुछ करने की जरूरत नहीं और सत्य उपलब्ध हो जाएगा...तो ये बातें भी उसे सुनायी नहीं पड़ती।जो अभी मूर्छित है, पहले तो उसकी मूर्छा तोड़नी पड़ेगी, ताकि वह सुन सके।आंख खोलने की बात भी तो उसके भीतर पहुंचनी चाहिए।
6-इसलिए सांख्य की मान्यता बिलकुल सही होकर भी काम नहीं कर पाती है।सांख्य का कोई व्यक्तित्व सांख्य की बातें कहे चला जाता है कि कुछ भी करना जरूरी नहीं है ;सिर्फ होश से भर जाना काफी है।लेकिन लोगों को सुनायी ही नहीं पड़ता है।क्योंकि वे सोए हुए नहीं हैं, वे मूर्च्छित हैं।और उनकी समझ में भी आ जाता है, तब वह समझ मात्र बौद्धिक होती है,अथार्त ऊपरी होती है।शब्द , सिद्धांत पकड लेते हैं और फिर उन्हीं सिद्धांतों को दोहराने भी लगते हैं। लेकिन उनके जीवन में कहीं कोई रूपांतरण नहीं होता।
7-सांख्य एक फूल की तरह है और जब फूल खिलता है, तब हमें जड़ों का खयाल भी नहीं आता।क्योंकि जड़ें तो अंधेरे गर्त में, पृथ्वी में छिपी पड़ी होती हैं। लेकिन वर्षों तक जड़ें निर्मित होती हैं, फिर पौधा निर्मित होता है और तब कहीं फूल खिलता है।फूल का खिल जाना एक लंबी शृंखला का हिस्सा है।जब फूल खिलता है तो सारी शृंखला भूल जाती है। जब फूल खिलता है तब सारी शृंखला छिप जाती है।और जब अंतिम फल आता है तो उस फल के आच्छादन में सब कुछ विस्मृत हो जाता है, जो लंबी यात्रा है।
8-लेकिन फूल न खिला हो, तो किसी से यह कहना कि फूल खिलना काफी है, खतरनाक भी हो सकता है। क्योंकि वह व्यक्ति जड़ों को संभालने के लिए और पौधे को बड़ा करने के लिए जो कर सकता था वह भी नहीं करेगा।अब तो वह भी यह सोचेगा, फूल खिल जाना काफी है, खिल जाएंगे। और खिलना तो एक लंबी शृंखला का हिस्सा है।जब लोग समझ लेते हैं
कि कुछ नहीं करना है तो जो कर रहे थे वह भी छोड़ देते हैं।और जिस फूल के खिलने की बात हैं; वह फूल भी नहीं खिलता।
क्रमशः
@Sanatan