मुजफ्फरनगर के मुस्तफाबाद गांव में मुस्लिम समुदाय लंबे समय से शांतिपूर्वक निवास कर रहा था। लेकिन जब बात इबादत की आई, तो उन्हें अपने ही गांव में एक मस्जिद की कमी महसूस हुई। समुदाय ने मेहनत से धन एकत्र किया, जमीन खरीदी, और मस्जिद के निर्माण की शुरुआत की। यह एक आशा भरा कदम था, जिससे लोग अपनी धार्मिक प्रार्थनाएं बिना किसी बाधा के अदा कर सकें।
लेकिन निर्माण कार्य शुरू होते ही विरोध की आवाजें उठने लगीं। स्थानीय हिंदू संगठनों ने आपत्ति जताई, काम रुकवा दिया, और इसे एक विवाद का रूप दे दिया। जैसे एक मस्जिद का निर्माण सांप्रदायिक सौहार्द को खतरे में डाल देगा। सवाल यह है कि धार्मिक स्वतंत्रता, जो संविधान में समान रूप से सभी के लिए सुनिश्चित की गई थी, क्या वह वास्तव में सभी नागरिकों के लिए लागू होती है?
आज, जब देश धार्मिक समावेशिता और लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करता है, तब ऐसी घटनाएं यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या धार्मिक आजादी हर नागरिक का समान अधिकार है, या इसे किसी विशेष समुदाय तक सीमित कर दिया गया है?
और अब इन दोगले हिंदुओं की असलियत देखो—ये वही लोग हैं जो विदेशों में जाकर "हमारा सम्मान, हमारे हक" का भोंपू बजाते हैं। वहां मंदिर खड़े करते हैं, "फ्रीडम ऑफ रिलिजन" की दुहाई देते हैं, सरकारों से टैक्स में रियायत मांगते हैं। लेकिन यहां? यहां मुसलमान की एक मस्जिद की नींव भी पड़ जाए तो इनका "हिंदुत्व का गुंडाराज" जाग जाता है। "धर्म खतरे में है" का शोर मचाते हैं, जैसे उनकी आस्था का ठेका सिर्फ मुसलमानों को दबाने से ही चलता हो। वाह रे हिंदू, विदेश में "मानवाधिकार" का नाटक, और अपने देश में "मजहब का मजाक"—तेरे इस दोगलेपन की तो सारी हदें टूट गईं, फिर भी तेरे मुंह से ढोंग की गंगा बहती रहती है!
लेकिन निर्माण कार्य शुरू होते ही विरोध की आवाजें उठने लगीं। स्थानीय हिंदू संगठनों ने आपत्ति जताई, काम रुकवा दिया, और इसे एक विवाद का रूप दे दिया। जैसे एक मस्जिद का निर्माण सांप्रदायिक सौहार्द को खतरे में डाल देगा। सवाल यह है कि धार्मिक स्वतंत्रता, जो संविधान में समान रूप से सभी के लिए सुनिश्चित की गई थी, क्या वह वास्तव में सभी नागरिकों के लिए लागू होती है?
आज, जब देश धार्मिक समावेशिता और लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करता है, तब ऐसी घटनाएं यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या धार्मिक आजादी हर नागरिक का समान अधिकार है, या इसे किसी विशेष समुदाय तक सीमित कर दिया गया है?
और अब इन दोगले हिंदुओं की असलियत देखो—ये वही लोग हैं जो विदेशों में जाकर "हमारा सम्मान, हमारे हक" का भोंपू बजाते हैं। वहां मंदिर खड़े करते हैं, "फ्रीडम ऑफ रिलिजन" की दुहाई देते हैं, सरकारों से टैक्स में रियायत मांगते हैं। लेकिन यहां? यहां मुसलमान की एक मस्जिद की नींव भी पड़ जाए तो इनका "हिंदुत्व का गुंडाराज" जाग जाता है। "धर्म खतरे में है" का शोर मचाते हैं, जैसे उनकी आस्था का ठेका सिर्फ मुसलमानों को दबाने से ही चलता हो। वाह रे हिंदू, विदेश में "मानवाधिकार" का नाटक, और अपने देश में "मजहब का मजाक"—तेरे इस दोगलेपन की तो सारी हदें टूट गईं, फिर भी तेरे मुंह से ढोंग की गंगा बहती रहती है!